तिल उपजाने की विधि।

बिहार में तिल (सेसम) की खेती विशेष रूप से खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है। यह एक महत्वपूर्ण तिलहन फसल है जो खाद्य तेल और अन्य उत्पादों के लिए उपयोग की जाती है। तिल की खेती छोटे किसानों के लिए एक अच्छा आय का स्रोत है।
तिल की खेती का महत्व:
बिहार में तिल (सेसम) की खेती विशेष रूप से खरीफ और रबी दोनों मौसमों में की जाती है। यह एक महत्वपूर्ण तिलहन फसल है जो खाद्य तेल और अन्य उत्पादों के लिए उपयोग की जाती है। तिल की खेती छोटे किसानों के लिए एक अच्छा आय का स्रोत है।
जलवायु और भूमि का चयन:
- तिल की खेती के लिए गर्म और शुष्क जलवायु सबसे उपयुक्त होती है।
- यह फसल सामान्यत 25-35°C तापमान पर अच्छी तरह से बढ़ती है।
- अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी, कछारी भूमि या बलुई मिट्टी में तिल की खेती अच्छी मानी जाती है।
बुवाई का समय:
- खरीफ मौसम:जून के मध्य से जुलाई के अंत तक बुवाई की जाती है।
- रबी मौसम:अक्टूबर के अंत से नवंबर की शुरुआत तक बुवाई का समय है।
भूमि की तैयारी:
तिल की खेती के लिए भूमि को 2-3 बार जुताई कर समतल और भुरभुरा बनाना चाहिए ताकि बीज अच्छी तरह से जम सकें। खेत में जीवांश पदार्थ और उर्वरकों का उपयोग करें ताकि मिट्टी की उर्वरकता बनी रहे।
बीज दर और बुवाई की विधि:
- तिल की खेती के लिए 4-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है।
- बुवाई लाइन से लाइन 25-30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे 10-15 सेंटीमीटर की दूरी पर की जानी चाहिए।
बीज की किस्मों का चयन:
बिहार में तिल की खेती के लिए कुछ प्रमुख किस्में:
- टी-13:
- यह बिहार के लिए एक उपयुक्त किस्म है।टी-13 तिल की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है। इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- मुख्य विशेषताएं:
- उच्च उत्पादन: 2500-3000 किलोग्राम/हेक्टेयर
- तेल सामग्री: 50-55%
- परिपक्वता दिन: 100-110 दिन
- पौधे की ऊंचाई: 120-150 सेमी
- बीज का आकार: मध्यम
- रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील
- फायदे:
- उच्च उत्पादन क्षमता
- उच्च तेल सामग्री
- मध्यम बीज आकार
- कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
- ठंड के प्रति सहनशील
- विशेष विशेषताएं:
- टी-13 किस्म "डबल-लो" किस्म है, जिसका अर्थ है कि इसमें एर्यूसिक एसिड और ग्लूकोसिनोलेट की मात्रा कम होती है।
- पुरस्कार और मान्यता:
- टी-13 किस्म को 2012 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
- स्वेता:
- स्वेता तिल की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है।
- मुख्य विशेषताएं:
- उच्च उत्पादन: 2800-3200 किलोग्राम/हेक्टेयर
- तेल सामग्री: 52-55%
- परिपक्वता दिन: 105-110 दिन
- पौधे की ऊंचाई: 130-160 सेमी
- बीज का आकार: मध्यम
- रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील
- फायदे:
- उच्च उत्पादन क्षमता
- उच्च तेल सामग्री
- मध्यम बीज आकार
- कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
- ठंड के प्रति सहनशील
- विशेष विशेषताएं:
- स्वेता किस्म "डबल-लो" किस्म है, जिसका अर्थ है कि इसमें एर्यूसिक एसिड और ग्लूकोसिनोलेट की मात्रा कम होती है।
- उच्च तेल सामग्री और उत्पादन क्षमता
- मध्यम बीज आकार और रोग प्रतिरोधक क्षमता
- यांत्रिक कटाई के लिए उपयुक्त
- कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त हैं।
- पुरस्कार और मान्यता:
- स्वेता किस्म को 2015 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
- एस.टी.एल-1:
- एसटीएल-1 तिल की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है।
- मुख्य विशेषताएं:
- उच्च उत्पादन: 3000-3500 किलोग्राम/हेक्टेयर
- तेल सामग्री: 55-58%
- परिपक्वता दिन: 100-105 दिन
- पौधे की ऊंचाई: 140-170 सेमी
- बीज का आकार: मध्यम
- रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील
- फायदे:
- उच्च उत्पादन क्षमता
- उच्च तेल सामग्री
- मध्यम बीज आकार
- कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
- ठंड के प्रति सहनशील
- विशेष विशेषताएं:
- उच्च तेल सामग्री और उत्पादन क्षमता
- मध्यम बीज आकार और रोग प्रतिरोधक क्षमता
- यांत्रिक कटाई के लिए उपयुक्त
- कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
सिंचाई प्रबंधन:
- खरीफ मौसम में तिल की खेती में आमतौर पर वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन सूखा पड़ने पर सिंचाई की आवश्यकता होती है।
- रबी मौसम में नियमित रूप से सिंचाई करनी होती है।
- खासकर बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली सिंचाई महत्वपूर्ण होती है।
खाद और उर्वरक प्रबंधन:
- तिल की खेती के लिए सही मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस, और पोटाश का प्रयोग आवश्यक है।
- नाइट्रोजन: 30-40 किलोग्राम/हेक्टेयर
- फास्फोरस: 20-25 किलोग्राम/हेक्टेयर
- पोटाश: 15-20 किलोग्राम/हेक्टेयर
- जिवांश खाद का भी प्रयोग फसल की उपज बढ़ाने में सहायक होता है।
रोग और कीट नियंत्रण:
- तिल की फसल में तना गलन और पत्तियों का झुलसा जैसे रोग आम होते हैं। इनसे बचाव के लिए बीजोपचार और फफूंदनाशकों का समय पर छिड़काव करना चाहिए।
- कीटों से बचाव के लिए जैविक और रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है।
कटाई और भंडारण:
फसल जब 70-80% पक जाए तब कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद तिल को सूखने के लिए खुली धूप में रखें ताकि नमी कम हो जाए। फिर अच्छी तरह से साफ करके सूखे स्थान पर भंडारण करें।
तिल की खेती के उपयोग और लाभ:
- तिल के उपयोग:
- खाद्य तेल: तिल से निकाला गया तेल खाने में उपयोग होता है। यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है और इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं।
- खाद्य पदार्थों में उपयोग: तिल के बीज का उपयोग मिठाइयों (तिलकुट, तिल के लड्डू), नमकीन, और बेकरी उत्पादों में किया जाता है। यह व्यंजनों में स्वाद और पौष्टिकता बढ़ाता है।
- आयुर्वेदिक और औषधीय उपयोग: तिल और तिल का तेल आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग होता है। यह त्वचा के रोगों, जोड़ों के दर्द, और मसाज के लिए भी प्रभावी माना जाता है।
- सौंदर्य प्रसाधन: तिल का तेल सौंदर्य प्रसाधनों में, जैसे कि बालों के तेल, त्वचा की क्रीम और साबुन में, उपयोग किया जाता है क्योंकि यह त्वचा को नमी देता है और पोषण प्रदान करता है।
- पशु आहार: तिल के तेल निकालने के बाद बची खली (तिलखल) को पशुओं के लिए प्रोटीन युक्त आहार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
- तिल की खेती के लाभ:
- स्वास्थ्य लाभ: तिल में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, और विटामिन पाए जाते हैं। यह हड्डियों को मजबूत बनाने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है। तिल का तेल कोलेस्ट्रॉल कम करने और हृदय स्वास्थ्य में सुधार के लिए उपयोगी होता है।
- आर्थिक लाभ: तिल एक नकदी फसल है। इसके बीज और तेल दोनों का बाजार में अच्छा मूल्य मिलता है, जिससे किसानों को आर्थिक रूप से लाभ होता है। साथ ही, तिल की मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बनी रहती है।
- भूमि की उर्वरता: तिल की खेती से भूमि की उर्वरता बनी रहती है क्योंकि यह मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को संतुलित करने में सहायक होती है। यह फसल चक्रीय खेती (रोटेशनल क्रॉपिंग) के लिए भी उपयोगी है।
- कम पानी की आवश्यकता: तिल की खेती में पानी की कम आवश्यकता होती है, जिससे यह उन क्षेत्रों में उपयुक्त है जहाँ सिंचाई की सुविधा सीमित होती है।
- जैविक खेती में सहायक: तिल की खेती में कम कीटनाशकों और उर्वरकों की आवश्यकता होती है, इसलिए यह जैविक खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
