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सरसों उपजाने की विधि।

1 अक्टूबर 20245
सरसों उपजाने की विधि।

बिहार में सरसों की खेती और इसके उपयोग का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां सरसों को मुख्य रूप से रबी की फसल के रूप में उगाया जाता है। बिहार की जलवायु और मिट्टी सरसों की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है। सरसों का उत्पादन मुख्यतः तेल निकालने के लिए किया जाता है, जिसका उपयोग खाना पकाने, मसाज तेल, और अन्य घरेलू उपयोगों में किया जाता है। इसके अलावा, सरसों की पत्तियों का उपयोग साग के रूप में भी किया जाता है।

Mustard

परिचय:

बिहार में सरसों की खेती और इसके उपयोग का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां सरसों को मुख्य रूप से रबी की फसल के रूप में उगाया जाता है। बिहार की जलवायु और मिट्टी सरसों की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती है। सरसों का उत्पादन मुख्यतः तेल निकालने के लिए किया जाता है, जिसका उपयोग खाना पकाने, मसाज तेल, और अन्य घरेलू उपयोगों में किया जाता है। इसके अलावा, सरसों की पत्तियों का उपयोग साग के रूप में भी किया जाता है।

जलवायु

  1. तापमान:
    • सरसों की खेती के लिए 10°C से 25°C के बीच का तापमान सबसे उपयुक्त होता है।
    • बुवाई के समय 18°C से 25°C के बीच तापमान फसल के अंकुरण के लिए आदर्श माना जाता है, जबकि पकने के समय हल्का ठंडा तापमान 10°C से 18°C फसल के अच्छे विकास के लिए लाभदायक होता है।
  2. वर्षा:
    • सरसों की फसल को अधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती है। 350-500 मिमी वार्षिक वर्षा सरसों के लिए पर्याप्त मानी जाती है।
    • बुवाई के समय हल्की नमी फसल के लिए अच्छी होती है, लेकिन अधिक वर्षा से फसल को नुकसान हो सकता है, इसलिए सरसों के विकास के समय वर्षा कम होनी चाहिए।
  3. नमी:
    • सरसों की फसल शुष्क वातावरण में बेहतर बढ़ती है। अत्यधिक नमी या जलभराव से फसल को नुकसान हो सकता है और रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है।
  4. सूर्य का प्रकाश:
    • सरसों को भरपूर धूप की जरूरत होती है। दिन के समय 6-8 घंटे की धूप फसल के लिए अनुकूल होती है। इससे पौधे का विकास अच्छा होता है और तेल की मात्रा बढ़ती है।
  5. हवा और वातावरण:
    • सरसों की खेती के लिए ठंडी और शुष्क हवाएँ अनुकूल होती हैं। गर्म और आर्द्र जलवायु फसल के लिए हानिकारक होती है, क्योंकि इससे फसल में रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है।

मिट्टी और बीज:

  1. मिट्टी का चयन:
    • सरसों के लिए दोमट और हल्की मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।
    • इसके लिए पीएच मान 6.0 से 7.5 तक सही माना जाता है।
  2. बीज बोने का समय:
    • बिहार में सरसों की बुवाई का सही समय अक्टूबर से नवंबर के बीच होता है। रबी सीजन में यह सबसे अधिक उगाई जाती है।
  3. बीज की मात्रा और दूरी:
    • एक हेक्टेयर भूमि के लिए लगभग 4-5 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। पौधों के बीच की दूरी 30-45 सेंटीमीटर और कतारों के बीच 10-15 सेंटीमीटर रखी जाती है।

सरसों की उच्च उपज वाली किस्में (High Yielding Varieties - HYV):

खेती के लिए लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये किस्में बेहतर पैदावार और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती हैं। बिहार में उगाई जाने वाली कुछ प्रमुख उच्च उपज वाली सरसों की किस्में निम्नलिखित हैं:

  1. पूसा बोल्ड:पूसा बोल्ड सरसों की विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है।
    • मुख्य विशेषताएं:
      1. उच्च उत्पादन: 3000-3500 किग्रा/हेक्टेयर
      2. तेल सामग्री: 40-42%
      3. परिपक्वता दिन: 120-125 दिन
      4. पौधे की ऊंचाई: 150-180 सेमी
      5. बीज का आकार: बड़ा
      6. रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील
    • फायदे:
      1. उच्च उत्पादन क्षमता
      2. उच्च तेल सामग्री
      3. बड़ा बीज आकार
      4. कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
      5. ठंड के प्रति सहनशील
    • पुरस्कार और मान्यता:
      • पूसा बोल्ड किस्म को 2005 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
      • यह सरसों की एक उन्नत किस्म है, जो बिहार में काफी लोकप्रिय है। इसका उत्पादन क्षमता प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल तक हो सकती है।
      • यह किस्म बीमारियों और कीटों के प्रति भी अच्छी प्रतिरोधक क्षमता रखती है।
  2. वरुणा (Varuna):वरुणा किस्म सरसों (Brassica juncea) की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है।
    • मुख्य विशेषताएं:
      1. उच्च उत्पादन: 2500-3000 किग्रा/हेक्टेयर
      2. तेल सामग्री: 38-40%
      3. परिपक्वता दिन: 120-125 दिन
      4. पौधे की ऊंचाई: 150-180 सेमी
      5. बीज का आकार: मध्यम
      6. रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील
    • फायदे:
      1. उच्च उत्पादन क्षमता
      2. रोग प्रतिरोधक क्षमता
      3. मध्यम बीज आकार
      4. कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
      5. ठंड के प्रति सहनशील
    • पुरस्कार और मान्यता:
      • वरुणा किस्म को 2003 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
      • वरुणा सरसों की सबसे पुरानी और प्रसिद्ध किस्मों में से एक है, जो बिहार के विभिन्न जिलों में उगाई जाती है।
      • इसकी उपज क्षमता भी 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।
      • यह सूखे और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार देती है।
  3. रजत (Rajat):राजत सरसों की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है
    • मुख्य विशेषताएं:
      1. उच्च उत्पादन: 3500-4000 किग्रा/हेक्टेयर
      2. तेल सामग्री: 42-45%
      3. परिपक्वता दिन: 120-125 दिन
      4. पौधे की ऊंचाई: 150-180 सेमी
      5. बीज का आकार: बड़ा
      6. रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील।
    • फायदे:
      1. उच्च उत्पादन क्षमता
      2. उच्च तेल सामग्री
      3. बड़ा बीज आकार
      4. कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
      5. ठंड के प्रति सहनशील
    • पुरस्कार और मान्यता:
      • राजत किस्म को 2010 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
      • रजत सरसों की एक और उच्च उपज देने वाली किस्म है, जो बिहार के कई इलाकों में उगाई जाती है।
      • इसकी प्रति हेक्टेयर उपज लगभग 18-20 क्विंटल होती है।
      • इसमें तेल की मात्रा भी अधिक होती है, जो इसे किसानों के बीच एक पसंदीदा विकल्प बनाती है।
  4. एलआर (Laxmi) 88:लक्ष्मी 88 सरसों की एक लोकप्रिय किस्म है, जिसका विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) द्वारा किया गया है। इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:
    • मुख्य विशेषताएं:
      1. उच्च उत्पादन: 3000-3500 किग्रा/हेक्टेयर
      2. तेल सामग्री: 40-42%
      3. परिपक्वता दिन: 120-125 दिन
      4. पौधे की ऊंचाई: 150-180 सेमी
      5. बीज का आकार: मध्यम
      6. रोग प्रतिरोधक क्षमता: डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति सहनशील।
    • फायदे:
      1. उच्च उत्पादन क्षमता
      2. उच्च तेल सामग्री
      3. मध्यम बीज आकार
      4. कहरिफ और रबी दोनों मौसमों में उपयुक्त
      5. ठंड के प्रति सहनशील
    • पुरस्कार और मान्यता:
      • लक्ष्मी 88 किस्म को 2008 में इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑयलसीड्स रिसर्च (आईएसओआर) द्वारा "बेस्ट वेराइटी" पुरस्कार मिला था।
      • यह सरसों की एक संकर किस्म है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता और बेहतर उपज के लिए जानी जाती है।
      • इसकी उपज क्षमता 20-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
      • इसमें तेल की मात्रा भी अधिक पाई जाती है।
  5. कृष्णा:
    • यह किस्म बिहार में सरसों की खेती के लिए उपयुक्त है और इसकी उपज क्षमता लगभग 18-22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।
    • यह जल्दी पकने वाली किस्म है और इसे समय पर कटाई के लिए तैयार किया जा सकता है।
  6. विभा:
    • विभा एक उन्नत किस्म है जिसे खासतौर से उच्च उत्पादन और कम सिंचाई की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।
    • इसकी उपज लगभग 20-24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो सकती है।
  7. आरएच 30 (RH 30):
    • आरएच 30 सरसों की एक और उच्च उपज देने वाली किस्म है, जो बिहार में किसानों के बीच लोकप्रिय है।
    • इसकी उपज क्षमता 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो सकती है।
    • इसमें तेल की मात्रा भी अच्छी पाई जाती है।
इन किस्मों का चयन किसान अपनी मिट्टी की गुणवत्ता, जलवायु, और खेती के साधनों के आधार पर करते हैं।

खाद और उर्वरक:

  • बुवाई से पहले खेत में 10-12 टन गोबर की खाद डालनी चाहिए।
  • इसके अलावा, 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फॉस्फोरस और 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर भूमि में दिया जा सकता है।

सिंचाई:

  • सरसों की फसल को ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती।
  • सामान्यतः 2-3 सिंचाई पर्याप्त होती हैं।
  • पहली सिंचाई बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद की जाती है और दूसरी फूल आने के समय।

कीट और रोग नियंत्रण:

  • बिहार में सरसों की फसल पर सफेद जंग, माहू, और अन्य कीटों का आक्रमण होता है।
  • इनके नियंत्रण के लिए समय-समय पर जैविक और रासायनिक उपाय किए जाते हैं।

कटाई और उपज:

  • सरसों की फसल लगभग 110-140 दिनों में तैयार हो जाती है।
  • जब पौधे के पत्ते पीले होने लगते हैं और फलियां पक जाती हैं, तब कटाई की जाती है।
  • एक हेक्टेयर भूमि से लगभग 12-15 क्विंटल उपज प्राप्त हो सकती है।

सरसों का उपयोग और लाभ:

सरसों (Mustard) का उपयोग न केवल हमारे खाने में बल्कि औषधीय और घरेलू उपचारों में भी किया जाता है। इसके बीज, तेल, और पत्तियों का विभिन्न प्रकार से उपयोग होता है।

  1. खाने में उपयोग:
    • सरसों का तेल: सरसों का तेल भारतीय रसोई में खाना पकाने के लिए सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। इसका तीखा स्वाद और खुशबू भोजन में एक विशेषता जोड़ती है। तेल को तलने, सब्जी बनाने और मसालेदार व्यंजन तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है।
    • सरसों के बीज: सरसों के छोटे-छोटे बीज का उपयोग मसालों के रूप में किया जाता है। इन्हें तड़के के लिए या चटनी, अचार आदि में डाला जाता है।
    • सरसों के पत्ते: सरसों के हरे पत्ते (सरसों का साग) का सर्दियों में विशेष रूप से उपयोग होता है। यह विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर होता है।
  2. औषधीय उपयोग:
    • सर्दी और खांसी में राहत: सरसों का तेल गर्म करके सर्दी और खांसी में छाती पर लगाने से आराम मिलता है। सरसों के तेल और लहसुन का मिश्रण भी जोड़ों के दर्द और सर्दी के लक्षणों को कम करता है।
    • पाचन में सहायक: सरसों के बीज का सेवन पाचन तंत्र को मजबूत करता है और पेट की समस्याओं जैसे अपच, गैस, और कब्ज में राहत देता है।
    • त्वचा और बालों के लिए: सरसों के तेल का उपयोग त्वचा को नर्म और मुलायम बनाए रखने के लिए किया जाता है। इसे बालों की जड़ों में मालिश करने से बाल मजबूत और घने होते हैं।
    • माइग्रेन और सिरदर्द: सरसों के तेल की मालिश सिरदर्द में राहत देती है। यह रक्त परिसंचरण में सुधार करता है और नसों को आराम देता है।
  3. एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण:
    • सरसों के तेल में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं, जो त्वचा के संक्रमण और फंगल इन्फेक्शन को ठीक करने में मदद करते हैं। इसे त्वचा के घावों पर भी लगाया जा सकता है।
  4. दिल की सेहत:
    • सरसों का तेल दिल के लिए बहुत फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) की मात्रा अधिक होती है। यह हृदय रोगों के खतरे को कम करता है और ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा देता है।
  5. प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है:
    • सरसों के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके एंटी-ऑक्सीडेंट गुण शरीर को बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं।
  6. वजन घटाने में मददगार:
    • सरसों के बीज में कैलोरी कम होती है और यह मेटाबॉलिज्म को बढ़ावा देता है, जिससे वजन घटाने में मदद मिलती है।
  7. डायबिटीज में उपयोगी:
    • सरसों के बीज और तेल का सेवन ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे यह मधुमेह के मरीजों के लिए भी फायदेमंद होता है।
सरसों के उपयोग और उसके फायदे से स्पष्ट होता है कि यह एक बहुउपयोगी और स्वास्थ्यवर्धक पौधा है। इसके तेल, बीज और पत्ते न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं, बल्कि हमारे शरीर के लिए भी बहुत लाभकारी होते हैं।